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Poetry by Syed Rizwan

Nazm | Self Portrait

मेरे चेहरे पे लाला फ़ाम सी सुर्ख़ी नहीं आई मुझे सहन-ए-चमन में रहके गुल पोशी नहीं आई मेरी आँखों में तीर-ए-ज़ोम भी है नीम कश ऐ गुल मेरे पैमाने-ए-कमख़्वाब में शोख़ी नहीं आई कहीं आँखों की शम्मा मुंतज़िर है शब के नालों की कहीं पाँव के छालों में अभी फुर्ती नहीं आई ये आँखों से जो बहता है वो दरिया थाम लेता हूँ किसी की याद जो चुपके से आती थी नहीं आई गरज़ क्या है किनारे को जुदा करने की कश्ती से अभी साहिल पे मौजों की हिना दस्ती नहीं आई किसी से क्या कहूँ मैं दास्तां ऐ शीशागर बतला मुझे दार-ओ-रसन से कोई भी चिट्ठी नहीं आई बजा है फूल पीते हैं मेरा खून-ए-जिगर अक्सर मगर इनको सुलगती मय अभी पीनी नहीं आई मेरी आँखों में जो उलझन है मैं और तू समझते हैं मगर अब जानने वाले इसे आँसू समझते हैं मेरी इस खुश्क महफ़िल में ना कोई जाम है साक़ी मेरे सीने की हलचल में अलिफ़ ना लाम है साक़ी मेरे कंधों पे सूरज है मेरे पैरों में छाले हैं नहीं रस्ता वो जिसके संग भी गुलफ़ाम है साक़ी ना ये खुर्शीद है मेरा ना ये मेहताब है मेरा मेरी हस्ती के रोज़-ओ-शब नहीं है शाम है साक़ी हवाले कर दिया ज़िंदान के सीनों की आतिश को अगर आज़ाद हो जाए तो ये कोहराम है साक़ी पिलाती है लहू मुझको समुंदर की ये खामोशी भले हाथों में मेरे इक चमकता जाम है साक़ी किसे पूछूँ मेरे अल्फ़ाज़ क्या से क्या बने होंगे ये दिल ऐसे तो शायर है मगर बदनाम है साक़ी नहीं मालूम है किसने लगाई है सदा मुझको लगेगी क्या दुआ लगती नहीं जब बद-दुआ मुझको मेरी आँखों ने इस चेहरे को दरिया करके छोड़ा है किसी की याद ने ज़ख़्मों को ताज़ा करके छोड़ा है अकेलेपन की ज़ंजीरों में लिपटी हैं मेरी बाहें इन्हीं तन्हाइयों ने मुझको तन्हा करके छोड़ा है किसे मालूम है सहन-ए-चमन के राज़ ऐ बुलबुल के माली ने सभी फूलों को मुर्दा करके छोड़ा है ये है फ़ितरत मेरी के मैं हूँ आशिक़ दास्तानों का मगर ख़ालिक़ ने किरदारों को सादा करके छोड़ा है सितारों से ही रौशन है मेरी मेहराब के क़िंदील वगरना चाँद ने तो सब को अंधा करके छोड़ा है ज़रा मुझको बता दे 'कुन' से दुनिया सींचने वाले ये क्यों तूने तेरी दुनिया को दुनिया करके छोड़ा है मेरी आवारा हस्ती को मुसव्विर कोई मेहवर दे के इस तस्वीर-ए-बेरंग में चमन के सारे रंग भर दे तू है रंग-ए-मुहब्बत आ वरक़ पर आ के छू मुझको मुकम्मल हो ही जाऊं मैं अगर मिल जाए तू मुझको ये आदत सीख ली है दिल ने बनने और बिगड़ने की कि मेरा चाक दामन ही सिखाता है रफ़ू मुझको क़लम हाथों में है मेरे तो डरना क्या है तैग़ों से नहीं भाती है ना हक़ खून की ये खुश्क बू मुझको मोहब्बत है मेरा ईमान-ए-कामिल दो जहानों में के तेरे हुस्न-ए-फ़ानी की नहीं है जुस्तजू मुझको नमाज़-ए-इश्क़ होनी है मेरे इस दिल की मस्जिद में इमाम-ए-दिल ठहर जा करके आने दे वज़ू मुझको मेरी तिश्ना लबी दरियाओं से बुझने नहीं वाली मेरे साक़ी के है अब ख्वाहिश-ए-जाम-ओ-सुबू मुझको जहाँ ना इख़्तिलात-ए-रंग-ओ-बू है और ना शबनम है नहीं ऐसे गुलिस्तां की मयस्सर आरज़ू मुझको वो बेआवाज़ सी बुलबुल जो गुलशन में नहीं आती न जाने उसका नौहा क्यों रुलाता है लहू मुझको मेरे क़ल्ब-ओ-ज़हन से खून-ए-फ़ितरत दौड़ उठठा है रगों में अब यही रंग-ए-बगावत दौड़ उठठा है मेरी दुनिया-ए-महफ़िल में बहुत से जाम हैं खुम हैं के इस दश्त-ए-जुनूँ में क़ैस भी महव-ए-तबस्सुम है मेरे अल्फ़ाज़ प्यासे हैं मेरे नग्मे अधूरे हैं ये मेरी प्यास ही है जो के सहरा हफ़्त-ए-कुलज़ुम है किनारे पर ही बैठा हूँ ना आए इस तरफ कोई अभी तस्वीर के अंदर की मौजों में तलातुम है यही तस्वीर है जो उस मुसव्विर को पुकारे है जो उसको छोड़ कर आईनों से महव-ए-तकल्लुम है यहीं क़िंदील के बाज़ू इसी खाली से कमरे में जो मैंने खुद की इक तस्वीर देखी थी वही गुम है मुसव्विर मैं खतावर हूँ तो तेरे ही करम से हूँ जो तेरे पास जन्नत है तो मेरे पास गंदुम है अभी तक दिल से इतनी बात का ग़म भी नहीं निकला मेरी फ़िरदौस से तो कोई आदम भी नहीं निकला