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Poetry by Syed Rizwan

Nazm | 1947

वो साल उन्नीस सौ सैंतालीस सरगोधा में कुछ ऐसा था आज़ादी के चौराहे पर बिन बादल बारिश जैसा था मतवाले थे आज़ादी के गलियों गलियों चौबारों में बाज़ारों में अखबारों में कॉलेज की चार दीवारों में उस कॉलेज में इक मलिका थी एक शम्मा थी परवानों में आंखों में इश्क मोहब्बत थी और चांद की बाली कानों में मैं उसकी मोहब्बत में अक्सर कुछ लफ्ज़ उतारा करता था इक छत से तारे गिन गिन कर रातों को गुज़ारा करता था बेबाक सी आंखें थी उसकी चेहरे से नूर बरसता था वो जब ज़ुल्फें लहराती थी मेहताब भी उस पर मरता था वो अक्सर कहती थी मुझसे एक रोज़ ये सरहद बननी है उस रोज़ हमारा क्या होगा? हमने तो मोहब्बत करनी है और मैं उससे ये कहता था सरगोधा मेरा घर है जी मैं और कहां पर जाऊंगा यह धरती ये अंबर है जी फिर वो भी ज़रा सी खुश होकर बाहों में उतर आ जाती थी स्याही में कभी घुल जाती थी नज़्मों में निखर आ जाती थी पर जब सरहद आबाद हुई सड़कों पर ख़ून ही ख़ून मिला उस दिन मज़हब की आंखों में नापाक सियासी खून मिला जब खून हमारे घर पहुंचा वो तब भी मुझको याद आई उस रात मैं रेल में बैठा जब एक पल को लगा फरयाद आई एक वादा था मेरा उससे मैं छोड़ के घर न जाऊंगा सरहद पे भले बंदूकें हो मैं फिर भी वापस आऊंगा बस इतना ही अफसाना था और फिर इक दुनिया टूट गई मैं अमृतसर को आ पहुंचा वो सरगोधा में छूट गई वो साल उन्नीस सौ सैंतालीस