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Poetry by Syed Rizwan

Ghazal | Us se khwahish na rahi na koi gila thehra

उससे ख़्वाहिश न रही ना कोई गिला ठहरा वही हमसाया जो हर सम्त जा-बजा ठहरा हर तरफ़ टूटते शीशे ही गूंजते हैं यहाँ गर वो पत्थर है तो फिर कौन आइना ठहरा? ऐसे कैसे मैं उसे संग-दिल करूँ तस्लीम! न मैं भला हूँ न वो हमसफ़र बुरा ठहरा लाख समझाए चला जाता हूँ मगर फिर भी उसी काफ़िर पे दिल आए जो बेवफ़ा ठहरा दिल जो रेज़ा हुआ तो ख़ाक हो गयी उम्मीद हम तो समझे थे कि पत्थर ही देवता ठहरा आख़िरश वो भी तो लाचार मौत मारा गया एक इंसान जो हर दौर में ख़ुदा ठहरा