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Poetry by Syed Rizwan

Ghazal | To ab is gham se bhi parda karoon main?

तो अब इस ग़म से भी पर्दा करूँ मैं? तुम्ही कह दो कि अब क्या क्या करूँ मैं? कभी तुम भी तो मानो बात मेरी तुम्हारी बात ही माना करूँ मैं? जो होना था वो आख़िर हो गया है अब उस लम्हे की क्या चर्चा करूँ मैं! अभी कुछ देर में बरसात होगी मेरे अश्कों को क्यों ज़ाया करूँ मैं? न तुम बंदे हो और न मैं ख़ुदा हूँ तो अब किस बात का पर्दा करूँ मैं? वो मुझको छोड़ कर जाता है जाए ज़बरदस्ती का क्यों सौदा करूँ मैं? नहीं टूटेंगे मुझसे चाँद तारे बड़ी बातों से अब तौबा करूँ मैं मुझे आदत नहीं है चीख़ने की बताओ किस तरह झगड़ा करूँ मैं? अधूरा प्यार भी क्या ख़ूब शय है नहीं मालूम कि कितना करूँ मैं! मैं अपने वक़्त से पहले मरा हूँ कहानीकार अब कैसा करूँ मैं?