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Poetry by Syed Rizwan

Ghazal | Ishq ki baat na kar saqiya maikhane mein

इश्क़ की बात न कर साक़िया मैख़ाने में इतनी गहरी भी नहीं है मेरे पैमाने में रौनक़ें लौट के आई हैं कहीं ये तो नहीं उसके अक़दाम पड़े हों मेरे वीराने में मुस्कुरा देता है खिड़की से चला जाता है क्या मज़ा आता है उसको मुझे बहकाने में? ऐब थे लाख मगर बेवफ़ा तो ना था वो यही एक ज़ोम था उस दश्त के दीवाने में तू कहीं और हो और रात यहाँ हो जाए देर इतनी न लगा लौट के आ जाने में __ साक़िया = मदिरा पिलाने वाला अक़दाम = पाँव ज़ोम = अहंकार