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Poetry by Syed Rizwan

Ghazal | Chaand taaron ne siskiyaan li hai

चाँद तारों ने सिसकियाँ ली है नींद की हमने गोलियाँ ली है सात फ़ाक़ों के बाद बच्चों ने अपने पैसे से रोटियाँ ली है इक सफर था सो ऐसे खत्म हुआ एक दो बार हिचकियाँ ली है अपनी पहली कमाई से उसने लाल रंगों की चूड़ियां ली है ग़म को बाज़ार में ले आए हैं हमने ज़ख्मों से तालियाँ ली है