Syed Rizwan Poetry ↗
← Back to all poems

Poetry by Syed Rizwan

Ghazal | Baithe baithe gaon ka manzar yaad aaya

बैठे-बैठे गाँव का मंज़र याद आया शाम हुई तो अपना ही घर याद आया उसके बाद भी हुस्न का चर्चा आम रहा शख़्स मगर फिर भी वो अक्सर याद आया एक जवाब जो भूल चुका था मैं शायद उसको आते देख के फ़र-फ़र याद आया और भी आँखें हैं जो मुझको ताकती हैं तेरे मैख़ाने से निकल कर याद आया शीशमहल में चादर देख के मख़मल की शहज़ादी को फूस का बिस्तर याद आया जंग में जान गयी जब पीठ के ज़ख़्मों से मुझको अपने यार का ख़ंजर याद आया ज्यूंही शकर नमक ने जिस्म को घेर लिया पंडित जी को मानसरोवर याद आया